Powered By Blogger

Sunday, September 18, 2011

एक से हैं भाजपा-कांग्रेस

हमारे देश में प्रचलित शासन प्रणाली काफी हद तक ब्रिटेन और अमेरिका से मिलती जुलती है। लेकिन एक चंीज जो इनसे अलग हमारे पास है, वह है हमारी दलीय व्यवस्था। इन दोनों देशों में द्विदलीय व्यवस्था का प्रचलन है। इससे इतर हमारे देश में बहु-दलीय व्यवस्था है। लेकिन गौर से देखा जाए तो हमारे देश में भी लगभग ऐसी ही व्यवस्था की स्थापना होती दिख रही है। देश में पार्टियों और नेताओं की कोई कमी नहीं है। बात जब व्यापकता और पहुंच की होती है तो अधिकतर पार्टियों का प्रभाव क्षेत्र किसी क्षेत्र विशेष तक सिमट कर रह जाता है। ऐसे में हमारे देश में मुख्य रूप से दो पार्टियां ही बचती हैं जिन्हें हम देश की राष्ट्रीय पार्टियों का दर्जा दे सकते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक तो देश में कई राष्ट्रीय पार्टियां हैं। लेकिन व्यवहारिक तौर पर कांगे्रस और भाजपा को छोड़कर और कोई ऐसी पार्टी नहीं है जिसकी राष्ट्रीय पहचान हो। भाजपा की स्थापना के बाद से देश के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि पिछले तीस सालों में बिना भाजपा और कांगे्रस के समर्थन के कोई भी देश में राज नहीं कर पाया। राजनीतिक मैदान में भले ही दोनों पार्टियों एक दूसरे की खिलाफत करती नजर आती हों लेकिन नीतियों और रीतियों में दोनों पार्टियां बिल्कुल एक जैसी हैं। यह बात तो देश की जनता भी साफ तौर पर जानती है। वाजपेयी सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती कांगे्रस सरकारों के सभी कार्यक्रमों को जारी रखा। ठीक इसी तरह मनमोहन सिंह की सरकार ने वाजपेयी के तमाम कार्यक्रमों को जारी रखा। दोनों ही एक दूसरे पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाती हैं जबकि दोनों पार्टियां ही सांप्रदायिक हैं। अगर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने का श्रेय भाजपा और उसके तमाम नेताओं को जाता है तो 1989 में मंदिर का ताला खुलवाने का श्रेय कांग्रेस को। अगर 2002 के गुजरात दंगे भाजपा सरकार के संरक्षण में हुए तो 1984 के सिख दंगे कांग्रेसियों और कांग्रेस सरकार द्वारा प्रायोजित थे। सबकुछ देश के सामने हुआ। लेकिन फिर भी देश के लोगों ने उन्हें चुनकर भेजा। कारण है विकल्पों की कमी। लोगों के सामने फिलहाल कोई ऐसी पार्टी नहीं है जो इन दोनों पार्टियों का विकल्प बन सके। इसलिए सबकी भलाई इसी में है कि मिलकर एक नए विकल्प की तलाश करें।