


छात्रजीवन किसी व्यक्ति के जीवन का बहुत महत्वपूर्ण समय होता है. इसी दौरान व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है. छात्रजीवन में छात्रसंघ के महत्व को कतई नकारा नहीं जा सकता. छात्रसंघ विद्यार्थी के लिए लोकतंत्र की प्रथम पाठशाला की तरह है. छात्रसंघ का पहला और मुख्य उद्देश्य छात्रों का सर्वांगीण विकास करना होता है. लेकिन वर्तमान में जैसे जैसे हमारी राजनीति, हमारा लोकतंत्र और हमारे समाज में फैली बुराईओं का सीधा असर छात्रसंघों पर भी देखा जा सकता है. अब छात्रसंघ का स्वरुप काफी बदल चुका है. जयप्रकाश के छात्र आंदोलनों को लोग भूलने लगे है. राजनीतिक परिदृश्य में धनबल, बाहुबल की बढ़ती धमक से छात्रसंघ भी अछुता नहीं रहां हैं. छात्रसंघ की राजनीति पर मीडिया का ध्यान जाने का तात्कालिक कारण राहुल गांधी का मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल से मिलना है। इस मुलाकात में उन्होंने उत्तर प्रदेश के तीन विश्वविद्यालयों में छात्रसंघों को पुर्नजीवित करने की मांग की है। इस सन्दर्भ में दो जरुरी बातें है। पहली बात यह कि लम्बे अरसे से इन विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ के कमरों पर ताले लगे हुए हैं। दूसरी बात यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और भारत सरकार के लोग छात्रसंघ को जरुरी नहीं मानते हैं। लेकिन राहुल गांधी की मांग से ऐसा लगता है कि वह ऐसा नहीं मानते हैं। जरूरत यह जानने की है कि राहुल गांधी ऐसा क्यों सोचते है ? क्या राहुल ने कोई अध्ययन किया है जिसके आधार पर वह ऐसा कर रहे हैं ? या फिर वह ये सवाल उत्तर प्रदेश के अपने मिशन 2012 के तहत उठा रहे हैं ? जिसमें वह युवाओं को सत्ता की सीढ़ी के रुप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। मेरा खयाल हैं कि राहुल गांधी को छात्रसंघ की समझ नहीं है। छात्रसंघ की बात को राहुल गांधी उठा रहे हैं ये छात्र राजनीति की विडंबना है। छात्र राजनीति को अपने इतिहास में ऐसी शर्मिंदगी कभी नहीं उठानी पड़ी होगी। शायद उन्हें यह पता नहीं कि भारत में छात्रसंघों का इतिहास कांग्रेस के इतिहास से पुराना है। भारत में 200 साल पहले कलकत्ता के एक कालेज में स्पेनिश प्रोफेसर ने छात्रसंघ की नींव रखी। जबकि कांग्रेस 125 साल पुरानी है। भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन और छात्रसंघ का अंकुरण साथ साथ हुआ। बहरहाल कांग्रेस के महासचिव जो मीडिया के हिसाब से युवराज हैं अगर वो इस बात को संजीदगी से उठा रहे है तो ये स्वागत योग्य है। छात्रसंघ देश और समाज के लिए हमेशा से आवश्यक रहा है। बीएचयू, इलाहबाद विश्वविद्यालय, अलिगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय हमेशा से अपनी अपनी राजनीति के केन्द्र रहे है और सत्ता प्रतिष्ठान की खिलाफत करते रहे हैं। जहाँ तक बात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की है वह अंग्रेजों के जमाने से क्रांतिकारीयों का गढ़ और शरणस्थली रहा है। आज़ादी के बाद छात्र राजनीति ने हमेशा से सत्ता पर अंकुश के लिए विपक्ष को मजबूत बनाया। वैसे तो छात्रसंघ सालों से बंद है और छात्र चुप हैं तो कोई कारण हैं। जरूरत हैं उन कारणों को समझने की। यह मेरा सवाल है कि क्या राहुल गांधी का ध्यान उन कारणों की ओर गया है और अगला सवाल यह है कि क्या इस तरह छात्रसंघ जागृत होने से छात्रसंघों का पुराना अस्तित्व लौट आएगा .एक समय था जब छात्रसंघ लोकतंत्र की नर्सरी की तरह होते थे लेकिन अब परिस्थितीयां बदल गयी है और लोकतंत्र की जो संस्थाए लोगों के जनशिक्षण का माध्यम हुआ करती थी उनमें क्षरण आ गया है. चाहे वो संसद हो, विधानसभा हो, न्यायपालिका हो या फिर मीडिया. तो इस बात की क्या गारंटी है कि छात्रसंघों पर पैसेवाले व कॉर्पोरेट विश्व के लोग कब्जा नहीं करेंगे. जो इसे सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंचना चाहते हैं. एक संस्था के तौर पर छात्रसंघ को पुनर्जीवित करना तो ठीक है लेकिन इसे प्रासंगीक करने के लिए क्या करना चाहिए इस बारे में सोचने की जरुरत है. अगर वास्तव में छात्र छात्रसंघ की जरुरत महसूस करते तो छात्र खुद ही आगे आकर इसके लिए मांग करते. आज कुछ छात्र नेता इस बात को सिर्फ स्वार्थवश उठा रहे है. न तो उन नेताओं के पास छात्रों का समर्थन है न ही कोई नया विचार. वह सिर्फ पुरानी लीक पिटना चाहते है. मुझे लगता है यह पूरी तरह व्यर्थ है। छात्र आज भी सोया हूआ नही हैं बल्कि छात्र आज ज्यादा समझदार है. उस समय भी छात्रों में अपराधीक गतिविधीयां पायी जाती थी. उस समय छात्रों को ऐसा लगता था कि राजनीतिक बदलाव से सम्पूर्ण बदलाव हो जाएगा. छात्रसंघ सत्ता में अंकुश रखने के माध्यम थे . जेपी के नेतृत्व में जो परिणाम आने चाहिए थे वे नहीं आ पाए. अब छात्र जानता है कि सरकारों के बदले जाने से कुछ नहीं होता. बल्कि जो बदलाव होते हैं वे ज्यादा विनाशकारी ही होते हैं. छात्रों का मन टूट चुका है. मन परिणाम देखकर टुटा है. इसलिए छात्रों का विश्वास टीकाने का एक ठौर चाहिए. आज स्थिती जेपी के समय से ज्यादा विकराल है लेकिन सुगबुगाहट की कमी है. लोगों को परिणामों की चिन्ता है. छात्रों का कोई दोष नहीं. अपने अनुभव से बता रहा हूँ कि आज छात्र ज्यादा तेजस्वी है और देश के लिए काम भी करना चाहते है लेकिन कमी है नेतृत्व की और संकट है विचारों का. इस रुप में पुराना विचार व्यर्थ है नए और प्रेरक विचारों की कमी है. दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रसंघ को एक सरदर्द मानता है इसीके चलते राहुल गांधी के सिफारिश और कपिल सिब्बल के आदेश के बावजूद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय छात्रसंघ का बोर्ड हटाकर छात्र कल्याण परिषद का बोर्ड लगा दिया गया है. बीएचयू में छात्रसंघों का इतिहास हमेशा से संघर्षपूर्ण रहा है. छात्रों ने समय समय पर लड़ाईयाँ लड़ी. इसके चलते आज़ादी के पहले व बाद में भी छात्रसंघों पर ताले पड़े. बावजूद इसके बार बार लड़कर छात्रसंघों का निर्माण किया गया. 1958 में बनारस हिदु विश्वविद्यालय के छात्रसंघ पर रोक लगाई गई. 1966 में यह पुनः अस्तित्व में आया और कुछ वर्षों पहले तक कार्यरत रहा. एक बात यह भी है कि 1991 से उदारीकरण और भूमंडलीकरण के चलते राजनीति और समाज में बड़ा बदलाव हुआ. इसका असर छात्रों पर भी पड़ा. जो भूमंडलीकरण मंडीकरण में बदला उसका सीधा असर छात्रों पर साफ देखा जा सकता है. आज छात्र भी दो प्रवृत्ति के होते हैं. एक वे जो अपराध और राजनीति में संलिप्त होते है और दूसरे वे जो सिर्फ पढ़ाई करना चाहते है और राजनीति को अछुत मानने लगते हैं. मुझे लगता है की दोनों ही प्रवृत्तियां अच्छी नहीं हैं. पहले शिक्षा के अधिकार को राज्यसूची से समवर्ती सूची में लाने की बात चली थी और आज दूसरी तरफ हम विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाजे खोलने जा रहे हैं. मुझे लगता है इस से आनेवाले दिनों में विपरित परिस्थितीयों से बचने के लिए एक ठोस सरकारी नीति की जरूरत है. साथ ही समय के हिसाब से छात्रसंघों के स्वरुप में बदलाव आना भी जरूरी है. वह परिवर्तन विचारों और स्वरुप दोनों में होना चाहिए. बिना किसी व्यापक परिवर्तन के छात्रसंघों की सार्थकता को लेकर सार्थक परिणाम की उम्मीद पूरी नहीं हो सकती. छात्रसंघों में व्यापक बदलावों की जरुरत छात्रजीवन किसी व्यक्ति के जीवन का बहुत महत्वपूर्ण समय होता है. इसी दौरान व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है. छात्रजीवन में छात्रसंघ के महत्व को कतई नकारा नहीं जा सकता. छात्रसंघ विद्यार्थी के लिए लोकतंत्र की प्रथम पाठशाला की तरह है. छात्रसंघ का पहला और मुख्य उद्देश्य छात्रों का सर्वांगीण विकास करना होता है. लेकिन वर्तमान में जैसे जैसे हमारी राजनीति, हमारा लोकतंत्र और हमारे समाज में फैली बुराईओं का सीधा असर छात्रसंघों पर भी देखा जा सकता है. अब छात्रसंघ का स्वरुप काफी बदल चुका है. जयप्रकाश के छात्र आंदोलनों को लोग भूलने लगे है. राजनीतिक परिदृश्य में धनबल, बाहुबल की बढ़ती धमक से छात्रसंघ भी अछुता नहीं रहां हैं. छात्रसंघ की राजनीति पर मीडिया का ध्यान जाने का तात्कालिक कारण राहुल गांधी का मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल से मिलना है। इस मुलाकात में उन्होंने उत्तर प्रदेश के तीन विश्वविद्यालयों में छात्रसंघों को पुर्नजीवित करने की मांग की है। इस सन्दर्भ में दो जरुरी बातें है। पहली बात यह कि लम्बे अरसे से इन विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ के कमरों पर ताले लगे हुए हैं। दूसरी बात यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और भारत सरकार के लोग छात्रसंघ को जरुरी नहीं मानते हैं। लेकिन राहुल गांधी की मांग से ऐसा लगता है कि वह ऐसा नहीं मानते हैं। जरूरत यह जानने की है कि राहुल गांधी ऐसा क्यों सोचते है ? क्या राहुल ने कोई अध्ययन किया है जिसके आधार पर वह ऐसा कर रहे हैं ? या फिर वह ये सवाल उत्तर प्रदेश के अपने मिशन 2012 के तहत उठा रहे हैं ? जिसमें वह युवाओं को सत्ता की सीढ़ी के रुप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। मेरा खयाल हैं कि राहुल गांधी को छात्रसंघ की समझ नहीं है। छात्रसंघ की बात को राहुल गांधी उठा रहे हैं ये छात्र राजनीति की विडंबना है। छात्र राजनीति को अपने इतिहास में ऐसी शर्मिंदगी कभी नहीं उठानी पड़ी होगी। शायद उन्हें यह पता नहीं कि भारत में छात्रसंघों का इतिहास कांग्रेस के इतिहास से पुराना है। भारत में 200 साल पहले कलकत्ता के एक कालेज में स्पेनिश प्रोफेसर ने छात्रसंघ की नींव रखी। जबकि कांग्रेस 125 साल पुरानी है। भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन और छात्रसंघ का अंकुरण साथ साथ हुआ। बहरहाल कांग्रेस के महासचिव जो मीडिया के हिसाब से युवराज हैं अगर वो इस बात को संजीदगी से उठा रहे है तो ये स्वागत योग्य है। छात्रसंघ देश और समाज के लिए हमेशा से आवश्यक रहा है। बीएचयू, इलाहबाद विश्वविद्यालय, अलिगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय हमेशा से अपनी अपनी राजनीति के केन्द्र रहे है और सत्ता प्रतिष्ठान की खिलाफत करते रहे हैं। जहाँ तक बात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की है वह अंग्रेजों के जमाने से क्रांतिकारीयों का गढ़ और शरणस्थली रहा है। आज़ादी के बाद छात्र राजनीति ने हमेशा से सत्ता पर अंकुश के लिए विपक्ष को मजबूत बनाया। वैसे तो छात्रसंघ सालों से बंद है और छात्र चुप हैं तो कोई कारण हैं। जरूरत हैं उन कारणों को समझने की। यह मेरा सवाल है कि क्या राहुल गांधी का ध्यान उन कारणों की ओर गया है और अगला सवाल यह है कि क्या इस तरह छात्रसंघ जागृत होने से छात्रसंघों का पुराना अस्तित्व लौट आएगा .एक समय था जब छात्रसंघ लोकतंत्र की नर्सरी की तरह होते थे लेकिन अब परिस्थितीयां बदल गयी है और लोकतंत्र की जो संस्थाए लोगों के जनशिक्षण का माध्यम हुआ करती थी उनमें क्षरण आ गया है. चाहे वो संसद हो, विधानसभा हो, न्यायपालिका हो या फिर मीडिया. तो इस बात की क्या गारंटी है कि छात्रसंघों पर पैसेवाले व कॉर्पोरेट विश्व के लोग कब्जा नहीं करेंगे. जो इसे सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंचना चाहते हैं. एक संस्था के तौर पर छात्रसंघ को पुनर्जीवित करना तो ठीक है लेकिन इसे प्रासंगीक करने के लिए क्या करना चाहिए इस बारे में सोचने की जरुरत है. अगर वास्तव में छात्र छात्रसंघ की जरुरत महसूस करते तो छात्र खुद ही आगे आकर इसके लिए मांग करते. आज कुछ छात्र नेता इस बात को सिर्फ स्वार्थवश उठा रहे है. न तो उन नेताओं के पास छात्रों का समर्थन है न ही कोई नया विचार. वह सिर्फ पुरानी लीक पिटना चाहते है. मुझे लगता है यह पूरी तरह व्यर्थ है। छात्र आज भी सोया हूआ नही हैं बल्कि छात्र आज ज्यादा समझदार है. उस समय भी छात्रों में अपराधीक गतिविधीयां पायी जाती थी. उस समय छात्रों को ऐसा लगता था कि राजनीतिक बदलाव से सम्पूर्ण बदलाव हो जाएगा. छात्रसंघ सत्ता में अंकुश रखने के माध्यम थे . जेपी के नेतृत्व में जो परिणाम आने चाहिए थे वे नहीं आ पाए. अब छात्र जानता है कि सरकारों के बदले जाने से कुछ नहीं होता. बल्कि जो बदलाव होते हैं वे ज्यादा विनाशकारी ही होते हैं. छात्रों का मन टूट चुका है. मन परिणाम देखकर टुटा है. इसलिए छात्रों का विश्वास टीकाने का एक ठौर चाहिए. आज स्थिती जेपी के समय से ज्यादा विकराल है लेकिन सुगबुगाहट की कमी है. लोगों को परिणामों की चिन्ता है. छात्रों का कोई दोष नहीं. अपने अनुभव से बता रहा हूँ कि आज छात्र ज्यादा तेजस्वी है और देश के लिए काम भी करना चाहते है लेकिन कमी है नेतृत्व की और संकट है विचारों का. इस रुप में पुराना विचार व्यर्थ है नए और प्रेरक विचारों की कमी है. दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रसंघ को एक सरदर्द मानता है इसीके चलते राहुल गांधी के सिफारिश और कपिल सिब्बल के आदेश के बावजूद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय छात्रसंघ का बोर्ड हटाकर छात्र कल्याण परिषद का बोर्ड लगा दिया गया है. बीएचयू में छात्रसंघों का इतिहास हमेशा से संघर्षपूर्ण रहा है. छात्रों ने समय समय पर लड़ाईयाँ लड़ी. इसके चलते आज़ादी के पहले व बाद में भी छात्रसंघों पर ताले पड़े. बावजूद इसके बार बार लड़कर छात्रसंघों का निर्माण किया गया. 1958 में बनारस हिदु विश्वविद्यालय के छात्रसंघ पर रोक लगाई गई. 1966 में यह पुनः अस्तित्व में आया और कुछ वर्षों पहले तक कार्यरत रहा. एक बात यह भी है कि 1991 से उदारीकरण और भूमंडलीकरण के चलते राजनीति और समाज में बड़ा बदलाव हुआ. इसका असर छात्रों पर भी पड़ा. जो भूमंडलीकरण मंडीकरण में बदला उसका सीधा असर छात्रों पर साफ देखा जा सकता है. आज छात्र भी दो प्रवृत्ति के होते हैं. एक वे जो अपराध और राजनीति में संलिप्त होते है और दूसरे वे जो सिर्फ पढ़ाई करना चाहते है और राजनीति को अछुत मानने लगते हैं. मुझे लगता है की दोनों ही प्रवृत्तियां अच्छी नहीं हैं. पहले शिक्षा के अधिकार को राज्यसूची से समवर्ती सूची में लाने की बात चली थी और आज दूसरी तरफ हम विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाजे खोलने जा रहे हैं. मुझे लगता है इस से आनेवाले दिनों में विपरित परिस्थितीयों से बचने के लिए एक ठोस सरकारी नीति की जरूरत है. साथ ही समय के हिसाब से छात्रसंघों के स्वरुप में बदलाव आना भी जरूरी है. वह परिवर्तन विचारों और स्वरुप दोनों में होना चाहिए. बिना किसी व्यापक परिवर्तन के छात्रसंघों की सार्थकता को लेकर सार्थक परिणाम की उम्मीद पूरी नहीं हो सकती. छात्रसंघों में व्यापक बदलावों की जरुरत छात्रजीवन किसी व्यक्ति के जीवन का बहुत महत्वपूर्ण समय होता है. इसी दौरान व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है. छात्रजीवन में छात्रसंघ के महत्व को कतई नकारा नहीं जा सकता. छात्रसंघ विद्यार्थी के लिए लोकतंत्र की प्रथम पाठशाला की तरह है. छात्रसंघ का पहला और मुख्य उद्देश्य छात्रों का सर्वांगीण विकास करना होता है. लेकिन वर्तमान में जैसे जैसे हमारी राजनीति, हमारा लोकतंत्र और हमारे समाज में फैली बुराईओं का सीधा असर छात्रसंघों पर भी देखा जा सकता है. अब छात्रसंघ का स्वरुप काफी बदल चुका है. जयप्रकाश के छात्र आंदोलनों को लोग भूलने लगे है. राजनीतिक परिदृश्य में धनबल, बाहुबल की बढ़ती धमक से छात्रसंघ भी अछुता नहीं रहां हैं. छात्रसंघ की राजनीति पर मीडिया का ध्यान जाने का तात्कालिक कारण राहुल गांधी का मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल से मिलना है। इस मुलाकात में उन्होंने उत्तर प्रदेश के तीन विश्वविद्यालयों में छात्रसंघों को पुर्नजीवित करने की मांग की है। इस सन्दर्भ में दो जरुरी बातें है। पहली बात यह कि लम्बे अरसे से इन विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ के कमरों पर ताले लगे हुए हैं। दूसरी बात यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और भारत सरकार के लोग छात्रसंघ को जरुरी नहीं मानते हैं। लेकिन राहुल गांधी की मांग से ऐसा लगता है कि वह ऐसा नहीं मानते हैं। जरूरत यह जानने की है कि राहुल गांधी ऐसा क्यों सोचते है ? क्या राहुल ने कोई अध्ययन किया है जिसके आधार पर वह ऐसा कर रहे हैं ? या फिर वह ये सवाल उत्तर प्रदेश के अपने मिशन 2012 के तहत उठा रहे हैं ? जिसमें वह युवाओं को सत्ता की सीढ़ी के रुप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। मेरा खयाल हैं कि राहुल गांधी को छात्रसंघ की समझ नहीं है। छात्रसंघ की बात को राहुल गांधी उठा रहे हैं ये छात्र राजनीति की विडंबना है। छात्र राजनीति को अपने इतिहास में ऐसी शर्मिंदगी कभी नहीं उठानी पड़ी होगी। शायद उन्हें यह पता नहीं कि भारत में छात्रसंघों का इतिहास कांग्रेस के इतिहास से पुराना है। भारत में 200 साल पहले कलकत्ता के एक कालेज में स्पेनिश प्रोफेसर ने छात्रसंघ की नींव रखी। जबकि कांग्रेस 125 साल पुरानी है। भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन और छात्रसंघ का अंकुरण साथ साथ हुआ। बहरहाल कांग्रेस के महासचिव जो मीडिया के हिसाब से युवराज हैं अगर वो इस बात को संजीदगी से उठा रहे है तो ये स्वागत योग्य है। छात्रसंघ देश और समाज के लिए हमेशा से आवश्यक रहा है। बीएचयू, इलाहबाद विश्वविद्यालय, अलिगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय हमेशा से अपनी अपनी राजनीति के केन्द्र रहे है और सत्ता प्रतिष्ठान की खिलाफत करते रहे हैं। जहाँ तक बात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की है वह अंग्रेजों के जमाने से क्रांतिकारीयों का गढ़ और शरणस्थली रहा है। आज़ादी के बाद छात्र राजनीति ने हमेशा से सत्ता पर अंकुश के लिए विपक्ष को मजबूत बनाया। वैसे तो छात्रसंघ सालों से बंद है और छात्र चुप हैं तो कोई कारण हैं। जरूरत हैं उन कारणों को समझने की। यह मेरा सवाल है कि क्या राहुल गांधी का ध्यान उन कारणों की ओर गया है और अगला सवाल यह है कि क्या इस तरह छात्रसंघ जागृत होने से छात्रसंघों का पुराना अस्तित्व लौट आएगा .एक समय था जब छात्रसंघ लोकतंत्र की नर्सरी की तरह होते थे लेकिन अब परिस्थितीयां बदल गयी है और लोकतंत्र की जो संस्थाए लोगों के जनशिक्षण का माध्यम हुआ करती थी उनमें क्षरण आ गया है. चाहे वो संसद हो, विधानसभा हो, न्यायपालिका हो या फिर मीडिया. तो इस बात की क्या गारंटी है कि छात्रसंघों पर पैसेवाले व कॉर्पोरेट विश्व के लोग कब्जा नहीं करेंगे. जो इसे सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंचना चाहते हैं. एक संस्था के तौर पर छात्रसंघ को पुनर्जीवित करना तो ठीक है लेकिन इसे प्रासंगीक करने के लिए क्या करना चाहिए इस बारे में सोचने की जरुरत है. अगर वास्तव में छात्र छात्रसंघ की जरुरत महसूस करते तो छात्र खुद ही आगे आकर इसके लिए मांग करते. आज कुछ छात्र नेता इस बात को सिर्फ स्वार्थवश उठा रहे है. न तो उन नेताओं के पास छात्रों का समर्थन है न ही कोई नया विचार. वह सिर्फ पुरानी लीक पिटना चाहते है. मुझे लगता है यह पूरी तरह व्यर्थ है। छात्र आज भी सोया हूआ नही हैं बल्कि छात्र आज ज्यादा समझदार है. उस समय भी छात्रों में अपराधीक गतिविधीयां पायी जाती थी. उस समय छात्रों को ऐसा लगता था कि राजनीतिक बदलाव से सम्पूर्ण बदलाव हो जाएगा. छात्रसंघ सत्ता में अंकुश रखने के माध्यम थे . जेपी के नेतृत्व में जो परिणाम आने चाहिए थे वे नहीं आ पाए. अब छात्र जानता है कि सरकारों के बदले जाने से कुछ नहीं होता. बल्कि जो बदलाव होते हैं वे ज्यादा विनाशकारी ही होते हैं. छात्रों का मन टूट चुका है. मन परिणाम देखकर टुटा है. इसलिए छात्रों का विश्वास टीकाने का एक ठौर चाहिए. आज स्थिती जेपी के समय से ज्यादा विकराल है लेकिन सुगबुगाहट की कमी है. लोगों को परिणामों की चिन्ता है. छात्रों का कोई दोष नहीं. अपने अनुभव से बता रहा हूँ कि आज छात्र ज्यादा तेजस्वी है और देश के लिए काम भी करना चाहते है लेकिन कमी है नेतृत्व की और संकट है विचारों का. इस रुप में पुराना विचार व्यर्थ है नए और प्रेरक विचारों की कमी है. दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रसंघ को एक सरदर्द मानता है इसीके चलते राहुल गांधी के सिफारिश और कपिल सिब्बल के आदेश के बावजूद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय छात्रसंघ का बोर्ड हटाकर छात्र कल्याण परिषद का बोर्ड लगा दिया गया है. बीएचयू में छात्रसंघों का इतिहास हमेशा से संघर्षपूर्ण रहा है. छात्रों ने समय समय पर लड़ाईयाँ लड़ी. इसके चलते आज़ादी के पहले व बाद में भी छात्रसंघों पर ताले पड़े. बावजूद इसके बार बार लड़कर छात्रसंघों का निर्माण किया गया. 1958 में बनारस हिदु विश्वविद्यालय के छात्रसंघ पर रोक लगाई गई. 1966 में यह पुनः अस्तित्व में आया और कुछ वर्षों पहले तक कार्यरत रहा. एक बात यह भी है कि 1991 से उदारीकरण और भूमंडलीकरण के चलते राजनीति और समाज में बड़ा बदलाव हुआ. इसका असर छात्रों पर भी पड़ा. जो भूमंडलीकरण मंडीकरण में बदला उसका सीधा असर छात्रों पर साफ देखा जा सकता है. आज छात्र भी दो प्रवृत्ति के होते हैं. एक वे जो अपराध और राजनीति में संलिप्त होते है और दूसरे वे जो सिर्फ पढ़ाई करना चाहते है और राजनीति को अछुत मानने लगते हैं. मुझे लगता है की दोनों ही प्रवृत्तियां अच्छी नहीं हैं. पहले शिक्षा के अधिकार को राज्यसूची से समवर्ती सूची में लाने की बात चली थी और आज दूसरी तरफ हम विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाजे खोलने जा रहे हैं. मुझे लगता है इस से आनेवाले दिनों में विपरित परिस्थितीयों से बचने के लिए एक ठोस सरकारी नीति की जरूरत है. साथ ही समय के हिसाब से छात्रसंघों के स्वरुप में बदलाव आना भी जरूरी है. वह परिवर्तन विचारों और स्वरुप दोनों में होना चाहिए. बिना किसी व्यापक परिवर्तन के छात्रसंघों की सार्थकता को लेकर सार्थक परिणाम की उम्मीद पूरी नहीं हो सकती.

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