Monday, November 28, 2011
देश को गिरवी रखने की तैयारी
सरकार ने पिछले दिनों रिटेल क्षेत्र के दरवाजे विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिये। मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के लिए आर्थिक सुधारों से संबंधित यह एक साहसिक कदम है। काफी दिनों से अपने ही बुने गए जाल में फंसी केंद्र सरकार कोई विशेष नीतिगत फैसले नहीं ले पा रही थी। लेकिन अब सरकार ने बहु-ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी और एकल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी है। तमाम आंतरिक और बाहरी विरोधों के बावजूद सरकार अपने फैसले पर अडिग नजर आ रही है। प्रमुख विपक्षी दलों भाजपा और वामपंथी दलों के मुखर विरोध के अलावा सरकार में हिस्सेदार कई दलों ने भी सरकार के इस फैसले का विरोध किया है। लेकिन कांग्रेस पार्टी है कि इस फैसले के पक्ष में तर्क देने से पीछे हटने को तैयार ही नहीं है। इन दिनों देश भर में इस फैसले को लेकर चर्चाओं का माहौल गरम है। सभी अपनी-अपनी समझ के हिसाब से फायदे और नुकसान का कैलकुलेशन करने में लगे हुए हैं। अर्थशास्त्री भी इस मुद्दे को लेकर दो हिस्सों में बंटे हुए नजर आ रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों, उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों के बीच जारी इस बहस में आम आदमी कहीं ना कहीं खोता हुआ नजर आ रहा है। जबकि जाहिर सी बात है कि इस सरकारी फरमान का सर्वाधिक असर उसी आम आदमी पर पड़ेगा। अच्छा या बुरा, यह तो बाद की बात है। इस फैसले का असर अच्छा होगा या बुरा यह तय करने के लिए हमें तह तक जाना बहुत ही जरूरी है। पक्ष और विपक्ष दोनों के तर्कों के आधार पर ही हम फायदे या नुकसान का सही-सही अनुमान लगा सकते हैं। लेकिन तर्कों के आधार पर कोई भी आकलन करने से पहले हमें जरूरत है देश के 450 अरब डॉलर के खुदरा यानी रिटेल बाजार की संरचना को समझने की। संरचना के आधार पर हम पूरे रिटेल बाजार को दो हिस्सों में बांट सकते हैं। पहला संगठित क्षेत्र और दूसरा असंगठित क्षेत्र। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि देश के कुल खुदरा बाजार में संगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी महज 7 फीसदी की है। जबकि 90 फीसदी से ज्यादा खुदरा बाजार अभी भी असंगठित क्षेत्र में ही काम करता है सरकार कह रही है कि एफडीआई के आने के बाद देश में एक करोड़ रोजगार पैदा होंगे। लेकिन सरकार यह बताने को तैयार नहीं है कि उसके इस फैसले से कितने लोग बेरोजगार हो जाएंगे। अपनी बात को सही साबित करने के लिए सरकार द्वारा दिया जा रहा एक अन्य तर्क यह भी है कि विदेशी निवेश को सिर्फ 10 लाख की आबादी वाले शहरों तक ही सीमित रखा जाएगा। लेकिन सरकार यह नहीं बता रही कि क्या उन शहरों में कोई रेहड़ी वाला, फेरी वाला, जनरल स्टोर्स नाम की एक छोटी सी दुकान वाला अपना कारोबार नहीं चला रहा है। शायद सरकार के पास अभी तक ऐसा कोई मैकेनिज्म नहीं है जिसके जरिए इस वर्ग के लोगों के बारे में सही तथ्य जुटाए जा सकें। कांग्रेसी सरकार कहती है कि देश का लगभग एक चौथाई उत्पादन इसलिए बर्बाद हो जाता है क्योंकि देश में उनके भंडारण और परिवहन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। उदारवादी अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि विदेशी पूंजी के आने से इन समस्याओं से आसानी से निपटा जा सकेगा। यह वाकई हमारे लिए शर्म की बात है कि देश के किसानों की मेहनत से पैदा हुई फसल को सहेजने के लिए हम विदेशी पंूजी की आस लगाए बैठे हैं। सबसे खास बात तो यह है कि सरकार अपनी इन शर्तों को निहायत ही कठोर और कड़ा बता रही है। साथ ही आवारा विदेशी पूंजी के लिए आतुर कांग्रेसी सरकार ने चरणबद्घ तरीके से इन शर्तों में ढील देने की गुंजाइश भी बाकी रखी है। यह विदेशी पूंजी हमारे देश के प्रतिभूति बाजार को किस तरह से नियंत्रित करती है वह तो हम सब जानते ही हैं। न्यूयार्क की वॉल स्ट्रीट में बैठे कुछ लोग किस तरह हमारे देश के छोटे निवेशकों को छलते हैं इस बात से हम सब वाकिफ हैं। लेकिन सरकार देश को गिरवी रखने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहती है। इसलिए अब सारे इंतजाम पूरे हो चुके हैं। देश का आम आदमी अभी भी सकते में है। विदेशी कंपनियां जश्न मना रही हैं और हम सब घर फूंक तमाशा देखने के लिए मजबूर हैं।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment